सोमवार, सितंबर 30

   हँसी   ख़ामोश  हो  जाती, ख़ुशी ख़तरे में पड़ती है ।
  यहाँ    हर  रोज़  कोई ‘दामिनी’ ख़तरे में पड़ती है ।
जुआ खेला था तो  ख़ुद  झेलते दुशवारियाँ उसकी ,
भला  उसके लिए क्यों  द्रौपदी ख़तरे में पड़ती है ।
हमारे   तीर्थों  के   रास्ते हैं इस  क़दर   मुश्किल,
पहुँच  जाओ  अगर तो वापसी ख़तरे में पड़ती है ।
पहाड़ों - जंगलों से तो  सुरक्षित है  निकल आती,
मगर शहरों के पास आकर नदी ख़तरे में पड़ती है ।
तभी    वो   दूसरे   आधार  पर   ईनाम  देते  हैं,
अगर  प्रतिभा को देखें, रेवड़ी  ख़तरे में पड़ती है ।
ज़रा बच्चों के ‘मिड-डे-मील’ को तो बख़्श दो भाई
ये  हैं  मासूम, इनकी  ज़िन्दगी ख़तरे में पड़ती है ।
परोसा है ग़ज़ल के नाम पर फिर ‘फेसबुक’ ने कुछ
नहीं  ‘लाइक’  करूँ  तो दोस्ती ख़तरे में पड़ती है ।