मंगलवार, जनवरी 24

बेशक कुछ नुकसान बढ़ा

बेशक कुछ नुकसान बढा
पर जीवन का ज्ञान बढ़ा.

दुनिया तुझको जान गई
अब खुद से पहचान बढ़ा.

जब भी शहर से लौटे हम
घर में कुछ सामान बढ़ा.

छोड़ के निकला अपना घर
तब आगे इंसान बढ़ा.

सिंधु असीमित था फिर भी
साहस कर जलयान बढ़ा.

या दुख ही कुछ कम कर ले
या हिम्मत भगवान बढ़ा.

तुमको सम्मानित करके
मेरा भी सम्मान बढ़ा.

12 टिप्‍पणियां:

  1. बेशक कुछ नुकसान बढा
    पर जीवन का ज्ञान बढ़ा.

    जब भी शहर से लौटे हम
    घर में कुछ सामान बढ़ा.

    यह अंश पसंद आये।

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  2. चन्दन जी,मेरे शे'र आपको पसंद आये ...आभारी हूँ

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    1. इस सार्थक पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें.

      कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen " की नवीनतम पोस्ट पर पधारकर अपना स्नेह प्रदान करें, आभारी होऊंगा .

      हटाएं
  3. रचना पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए आभार....
    ओमप्रकाश यती

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  4. wah kya baata hai.Bhut acha likha hai.kbhI mere blog ,"UNwarat.com" para aiye.
    Vinnie,

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  5. waaah sirji kya baat hai...khaaskar ye sher -
    छोड़ के निकला अपना घर
    तब आगे इंसान बढ़ा.

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  6. nc post sr / ise mae fb par apne group ' madhuban' me me share kar rahi hu / :)

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